
सूरज भी शांत, निगाहे लाल होती है जब शाम ढलती है......
वक़्त के साथ जिंदगी भी देखो क्या क्या रूप बदलती है.......
रेशा रेशा कतरा कतरा तिल तिल आखरी बूंद तक रोशनी
दिन में कौन पूछता है उस शमां को जो सारी रात जलती है.......
खाता खेलता मस्त रहता था, ना कोई शौक ना कोई आरज़ू
मुरव्वत सी थी जिस से आजकल वही तन्हाई बहुत खलती है.....
हमें हमेशा से आदत रही हँस के गले लगाने की,वही दिखाता है....
बज़्म में नज़्म होता है,दिल की आह तन्हाई में ही निकलती है......