ये वाणिज्य शास्त्र का सूत्र और खेल भी बड़ा अजीब है.....
खुसकिस्मती कहे या दुर्भाग्य, कैसा देश का ये नसीब है....
महज़ बतीस रुपये दूर खड़ी है अमीरी, स्तब्ध, अस्मंजीत,
और फिर भी देखो देश की एक तिहाई जनता गरीब है.....
कभी कभी सोचता हु, कितना गूढ़ ये रहस्य है जीवन का,
जिन्हें अज़ीज़ बना सर आँखों पे बैठाया,वही मेरा रकीब है....
एक दिन की ही सही, आमिरी का ताज तो मिले मुझे भी,
या खुदा तैतीस रुपये दे दे,जिंदगी की ये आखरी तरकीब है.....
बचपन से सपना था."एक दिन मै भी गरीब ना रहूँगा",
अभी भी गले लगा नहीं सकता, जब तू इतनी करीब है......
न कोई मज़ा है, न कोई काम है......
जिंदगी तो बस ढलती हुई शाम है.....
ना हसरत है कोई, ना अरमान है......
ना कोई ख्वाहिश है, ना एहतराम है ........
मकसद भी नहीं कोई, ना रास्ता है..........
बिना कुछ किये ही हम तो बदनाम है......
ना चेहरा है कोई, ना मेरी कोई पहचान है.....
गुमशुदा गुमनाम हु यारो,ना कोई नाम है.....
बस चंद ठोकरे है जिंदगी में हासिल मुझे.....
यही मेरी किस्मत, यही मेरा ईनाम है..........
बस एक जुस्तजू है, किसी की तलाश है...
कुछ खास नहीं,ज़ीने की वजह बहुत आम है...
कल कलम थी जिन हाथो में आज जाम है....
वो आगाज़ था, ये मेरी जिंदगी का अंजाम है......