Friday, September 23, 2011


ये वाणिज्य शास्त्र का सूत्र और खेल भी बड़ा अजीब है.....
खुसकिस्मती कहे या दुर्भाग्य, कैसा देश का ये नसीब है....

महज़ बतीस रुपये दूर खड़ी है अमीरी, स्तब्ध, अस्मंजीत,
और फिर भी देखो देश की एक तिहाई जनता गरीब है.....


कभी कभी सोचता हु, कितना गूढ़ ये रहस्य है जीवन का,
जिन्हें अज़ीज़ बना सर आँखों पे बैठाया,वही मेरा रकीब है....

एक दिन की ही सही, आमिरी का ताज तो मिले मुझे भी,
या खुदा तैतीस रुपये दे दे,जिंदगी की ये आखरी तरकीब है.....


बचपन से सपना था."एक दिन मै भी गरीब ना रहूँगा",
अभी भी गले लगा नहीं सकता, जब तू इतनी करीब है......

3 comments:

  1. oh, wow such a nice poem on such a current topic and making such a valid and forceful point! Excellent work mate.

    Hoping and waiting for more Hindi goodness for you :)

    Hey why don't you give a good title to this one?

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  2. thanks RAVS....
    well gazals ...does bot have title......the best line of gazals..(Usually last one)is considered as title.

    well I will try to write more..when ever i feel like writing.

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  3. hmm.. I didn't know that Ghazals don't have a title!

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