Thursday, September 29, 2011

नज़र भर नीहार लू , गर तुम्हे कोई ऐतराज़ नहीं है..




गाना तो बहुत चाहता हु, पर आवाज़ नहीं है.....
दिल में है एक धुन, पर हाथ में साज़ नहीं है......

तुम जो बार बार पूछते हो,"क्या हुआ तुम्हे"
कैसे बताए, कुछ मर्ज़ है जिनका इलाज़ नहीं है.....

सुन के खनक उनके आवाज़ की अच्छा लगा ,
अब हो गया है यकीं,वो मुझसे नाराज़ नहीं है.....

तुम हकीक़त हो या ख्वाब ये अब तक राज़ है
तुम्हे मल्लिका-ए-जन्नत बनाता पर ताज नहीं है........

इन आँखों में बस तुम्हारी तस्वीर बसाना चाहता हु
नज़र भर नीहार लू , गर तुम्हे कोई ऐतराज़ नहीं है....

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